एक होता है किस्सा. एक होती है दास्तान. किस्सा होता है छोटा. दास्तान, लंबी कहानी. यही लंबी कहानी कहने का जो हुनर है, वो होता है दास्तानगोई. जैसे किस्सागोई होती है, वैसे ही.
ईरान से हिंदुस्तान आया ये हुनर. करीब 13वीं शताब्दी में. अब कोई चीज़ हिन्दुस्तान आए और उस पर हिन्दुस्तानी रंग न चढ़े, ये तो हो ही नहीं सकता. तो बस दास्तानगोई भी रंग उठी हिन्दुस्तानी रंग में और मुक़म्मल तौर पर हिंदुस्तानी हो गई. अकबर के दौर में ये काफी लोकप्रिय हुई. बादशाह ने दास्तानगोई को ज़िंदा रखने के लिए बहुत काम करवाया, इस तरह शहर-ए-दिल्ली में दास्तानगोई बहुत फेमस हुई. पहले-पहल दास्तान दो तरीके की हुआ करती थी: रज्म यानी जिसमें शासकों की बड़ी लड़ाइयां बताई गई हों. और बज़्म यानी महफ़िलों के किस्से.
जब यह फ़न लखनऊ पहुंचा तो इसमें दो नई शाखें पनपीं. ‘तिलिस्म’ और ‘अय्यारी’ की. यानी बहरूपिए और जादूगरों की दास्तानें भी सुनाई जाने लगीं.
दास्तानें तो बहुत-सी सुनाई गई, पर इनमें सबसे मशहूर हुई ‘दास्तान-ए-अमीर-हमज़ा’. इस दास्तान में क्या था? इसमें हजरत मोहम्मद साहब के चचा ‘अमीर हमज़ा’ की जिन्दगी और उनके शानदार कारनामों का बयान था. कहते हैं हर तहज़ीब, हर शय फ़ना होती है, दिल्ली के आख़िरी पेशेवर दास्तानगो ‘मीर बाकर अली’ का इन्तक़ाल 1928 में हुआ और इसके साथ ही ये अज़ीम रवायत भी फ़ना हो गई. हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म की धारणा है जिसका किस्सागोई से कोई लेना देना नहीं है, इतना ज़रूर है कि किस्सागोई की कहानी 1928 में ही खत्म नहीं हुई. 2005 में मशहूर उर्दू नक़्क़ाद (आलोचक) ‘शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी’ साहब ने इस फ़न को दोबारा ज़िन्दा करने की कोशिश की. इस मुहीम में उनका साथ दिया उनके भतीजे ‘महमूद फारुकी’ ने.